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Being Fragile ...

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It's winter blues, and the snow flakes around, Chilly grasses and dewdrop on windows sound, I take my seat and look outside with a glee, Are the trees listening or it's just me?? For the swirling winds touches my nakedness wide.. The abandoned nests, makes me heavy inside, Seems the longest winter of countryside, Lest nothing settles, in these withered eyes.. Flowers are frozen, the roads died mum, Looking for a light, hideous played the sun, But the gracious mountain gloomed like a bride, Still, Whispers my vintage soul to stay inside.. Long sleeves of my shirt also senses my shiver, Heart beats fatigue and numb plays the mirror, My fingers are cold and blanket feels I am fragile, Don't knock my doors, it feels safe inside.. In captivity, when my bones started to break, Voice without words, came out with a wreck, I shouted my name, it echoed with a tree, Releasing binding chains, my spirit break away free...

THE OTHER SIDE

Hi friends. My greetings to all.. This is my first blog,  which i would like to address it on domestic pets. People around the globe are very enthusiastically interested to know about pets, on how to nurture them, how to keep them as companions and lot more. All of them (mostly) love to talk about them. They feed them as their own kids, or one of the important family members. It has become an important part of human life these days. Their mere presence is very natural and pure to the ones who are compassionate about them. They act like your silent companions in your bad times and prevent most of the times to take toll of any bad event taking on you. To take them for a walk, is like a refreshing change in our busy schedules, both of the pet and us. A different set or class of people we see around, are mostly very keen on keeping animals as domestics.  We notice them as an elite class most of the times also some mediocre people. Anyways keeping animals as pets, has been accepted...

गुलाम..

 गुलाम रूहों के कारवां में,  जरा सी आवाज़ भी नहीं है.. उबलते दफ्न हो चुके जज़्बातो की लहर के, रेत से घिरे किनारे भी नहीं हैं.. मिटा चला जा रहा है इस जिंदगी से सिजदे यूँ, कि झुकते हुए शीश के अब निशां भी नहीं हैं.. लहू टपकता जा रहा है, मेरे आस्तीन से, देखो कहीं जमीं इसे कहीं फिर छुपा ना ले.. आखों के नीर बयां करते हैं, मेरी व्यथा, देखो कहीं फिर हम दिल में इसे दबा ना लें.. कैदी बनें हैं सदियों से अपने ही बनाए घर में, आस्मां फिर चूक न जाए, देखो कहीं छत इसे फुसला न ले.. उठो मेरे इबादत के पाश्वानों, संध्या ढलती चली है.. अनन्तकाल से दबी मुहब्बत जो तेरे दिलों में, तपिश सूरज की पुकारते थकी, बुझती चली है.. उठो कि तारीख हमारे राहगुज़र में रोज़ बदलती, फडफडाते दिए की लौं, बावली घटा से लड़कर बचती, उठो, कि उसी आरज़ू से करीना तेरी, फिर तुम्हारा नाम फलक पर ढूँढने चली है...  

Yaariyan

मेरी किताब का वो सबसे हसीन किस्सा है, जिसमे कुछ, यारों के बारे में लिखा है, लड़कपन की उम्र से निकले थे सब घर से दूर, फिर सांज आज जब घर लौटे, थकना भी एक हिस्सा है... नहीं होती अब लंबी फोन पर उनसे बातें, फुर्सत की कमी, से नम होती हैं आँखें, यादों के खत लिखकर ही पूछ लेते हैं हाल-चाल, भागते-दौड़ते दोस्तों से पूछने को ना रहे कोई सवाल... क्या हुआ अगर, जो दुर्मिल अब ताल्लुकात हैं, झुर्रियाँ और सफेद बालों में उलझी, कई अनकही बात हैं, एक ज़माना था, जब सारे तितलियों के दिवाने थे, सिर्फ पागलपन ही नहीं, प्रेम के भी फसाने थे... कुछ दर्द अपनाते, कुछ अपना सुनाते, बातों बातों में, अपना-पराया भूल जाते, हँसकर यूँही घंटो कर ली बातें, अंजाने को भी आज़माने की अक्ल कहां से लाते ? नहीं रहा आज वो ज़माना, फिर भी एक सुकून है, यारीयां दिल में है कायम, इसका यकीन है, जिंदगी के कारोबार में, खुशी-रंज से सब परे रहें, दुआ है, तूफानों में भी, कागज़ की नाँव उनकी चलती रहे... किताब का आखरी पन्ना देखते-देखते जब भी आए, कोशिश रहे मेरी, ईश्वर यारी सबको सिखलाए,  कि छवीं ऐसी बनाओ, जब किसी के करीब आओ, उससे मिलत...

Farebi

एक सवाल फिर उठा, मेरे ज़ेहन पर, ढूँढते रहे इश्क हम, समंदर की गहराई पर, पूछें हम खुदा से, मिलेगी वफ़ा हमें कहाँ पर, इत्तेफाक की बात है, वो मिली फरेब की जुबां पर.... कुछ समझ नहीं आता, फेरबी मुहब्बत से कैसे निकलें, काबिलियत है तेरी, सारी साज़िशे बेअसर निकले, खता भरे प्यार की, कैसी इनायत हमपर हुई, तोबा किए हम, तेरे इश्क से मुझे हरारत हुई.... कोशिशें बहुत की, फरेबी परिंदे का शीश महल तोड़ दूँ अरमानों का घर, खयालातों से मोड़ दूँ, कहा मुझसे परिंदे नें, ना बता, मुझे जाना किधर है.... टूटे भी अगर पंख मेरे, तेरा आसमान ही मेरा घर है....

सिलवटें

आज फिर सुकून की नींद की कमी सी है, बिखरे सितारों की गर्दिश में, मेरी रात फिर थमी सी है... तेरी आगोश में बुझी थी मेरी, सुलगते ख़्वाहिशों की प्यास, तेरे प्यार करने की रवायतों से, मुझे शिकायतें सी हैं... अपनी कमीज़ों में तेरी खुशबू जो महफ़ूज रखें हैं, तेरे नजदीक होने का एहसास दिला देते हैं... अनगिनत लोगों के बींच, याद हैं मुझे तेरी गहरी आँखे, तेरी मुहब्बत मुझ काफ़िर को, सजदे में झुकना सिखा देते हैं... तुझे भूलने का हुनर कमबख़्त सीख जाते हम लेकिन, मेरी चादरों की सलवटों में, तेरी सांझ बुझी-बुझी सी है... बेशक बदनाम हो जाएँ हम, तेरे जिक्र का जाम पीते हुए, क्या करें? तेरे दीदार बिना मेरी महफ़िलें, रुकी-रुकी सी है... Dr. Shruti Nabriya

Chingaari

कम तेल में पिरोकर, मेरी लौ को सांसे मिली, हवा से मिली पनाह, इसे बुझा ना दे कहीं.. झुका देती है वहीं मस्तक, हवा का रुख जहाँ बदले, धीमी-धीमी बस जलती रहें, ख्वाब इसके बुलंद नहीं... शुक्र है खुदा का, जो अंधेरा गहरा था, चिंगारी की किरनों नें, रात न आने दी... कंपकपाते हुए हाथों में, थामी हैं मैनें लौ, बहकी अगर इसकी नीयत, मुझे जला ना दे कहीं ....