Chingaari

कम तेल में पिरोकर, मेरी लौ को सांसे मिली,

हवा से मिली पनाह, इसे बुझा ना दे कहीं..

झुका देती है वहीं मस्तक, हवा का रुख जहाँ बदले,

धीमी-धीमी बस जलती रहें, ख्वाब इसके बुलंद नहीं...

शुक्र है खुदा का, जो अंधेरा गहरा था,

चिंगारी की किरनों नें, रात न आने दी...

कंपकपाते हुए हाथों में, थामी हैं मैनें लौ,

बहकी अगर इसकी नीयत, मुझे जला ना दे कहीं ....

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