Farebi
एक सवाल फिर उठा, मेरे ज़ेहन पर,
ढूँढते रहे इश्क हम, समंदर की गहराई पर,
पूछें हम खुदा से, मिलेगी वफ़ा हमें कहाँ पर,
इत्तेफाक की बात है, वो मिली फरेब की जुबां पर....
कुछ समझ नहीं आता, फेरबी मुहब्बत से कैसे निकलें,
काबिलियत है तेरी, सारी साज़िशे बेअसर निकले,
खता भरे प्यार की, कैसी इनायत हमपर हुई,
तोबा किए हम, तेरे इश्क से मुझे हरारत हुई....
कोशिशें बहुत की, फरेबी परिंदे का शीश महल तोड़ दूँ
अरमानों का घर, खयालातों से मोड़ दूँ,
कहा मुझसे परिंदे नें, ना बता, मुझे जाना किधर है....
टूटे भी अगर पंख मेरे, तेरा आसमान ही मेरा घर है....
Comments
Post a Comment