सिलवटें

आज फिर सुकून की नींद की कमी सी है,

बिखरे सितारों की गर्दिश में, मेरी रात फिर थमी सी है...

तेरी आगोश में बुझी थी मेरी, सुलगते ख़्वाहिशों की प्यास,

तेरे प्यार करने की रवायतों से, मुझे शिकायतें सी हैं...

अपनी कमीज़ों में तेरी खुशबू जो महफ़ूज रखें हैं,

तेरे नजदीक होने का एहसास दिला देते हैं...

अनगिनत लोगों के बींच, याद हैं मुझे तेरी गहरी आँखे,

तेरी मुहब्बत मुझ काफ़िर को, सजदे में झुकना सिखा देते हैं...

तुझे भूलने का हुनर कमबख़्त सीख जाते हम लेकिन,

मेरी चादरों की सलवटों में, तेरी सांझ बुझी-बुझी सी है...

बेशक बदनाम हो जाएँ हम, तेरे जिक्र का जाम पीते हुए,

क्या करें? तेरे दीदार बिना मेरी महफ़िलें, रुकी-रुकी सी है...

Dr. Shruti Nabriya

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