स्याही

स्याही..
लिखो, मिटाओ; फिर लिखो, फिर मिटाओ;
कोरे पन्नों को स्याही से भरते चले जाओ,
मन कुछ हल्का हो तो उँड़ेलो काग़ज़ पर,
क़िस्सा ख़त्म हो तो, मरोड़ो नज़्मो पर..
दर्द लिखने से कम होते नहीं बढ़ते चले जाते हैं,
पुराने ज़ख़्म फिर से उभरते नज़र आते हैं..
पीछे पलट कर देखूँ, तो अल्फ़ाज़ मिले रद्दी के ढेर में,
बिकते मिले जज़्बात बाज़ारों की भीड़ में..
गलती हुई जो किरदारों को वफ़ादार समझ बैठे,
भूल हुई , हम किस्से को कहानी समझ बैठे..
- डॉ श्रुति नाबरिया
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