कुछ लिखते हैं

कुछ लिखते हैं..

कई दिनों बाद आज जब कुछ लिखने लगे,
दबे शब्द सीने में व्याकुल से होने लगे,
कविता होठों पर मेरे रुकी रुकी सी रही,
पहचान से गुमशुदा रहने को कहती रही..

उनकी ना सुनकर मैं कहना चाहूं एक बात,
अपना किरदार बदल लूँ अगर एक रात..
भूल जाऊ सभी समाजों के मुखौटों को,
मान लो तुम भी, एक से चेहरे हैं हम दोनों को. .

तुम और मैं के बींच हो जाए सीमा खत्म,
फिर चर्चा कैसी, नए रूप हो हम एकात्म..
ना रंगों का भेद, हो समस्त बुराइयों की समाप्ति,
अपने निज भावों में पाऊँ, मैं नये गहराईयों की प्राप्ति..

रेगिस्तान से तपते रेत पर आज तक चलते चलते,
नंगे पाँव मेरे थकते और जलते-भुनते,
तेरे मिलन के बाद जैसे उनपर बरसात सी पडी हो,
बावले अंतर्द्वंद को जैसे पूर्णता मिली हो..

सुख दुःख की परिभाषा को यहाँ खत्म करते हुए,
अनचाहे ज़ख्मों पर शब्दों के मरहम लगाते हुए,
व्यथित मन को सहलाती हुई, व्यक्त होती, मेरी कविता,
फिर लौटी मेरे मुख पर, मुस्कान बन, मेरी कविता..

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