Trushna

आज गम ने भी मेरा हाल, ठहर कर पूछ ही लिया,

मरी हुई तृष्णाएँ भी मुझे, एक टूटी काठी सौंप गया;

इतना तो सिखा जाता, बिखरे अँधेरों में चलते कैसे हैं?

अपनों के बीच रहते हुए भी क्यूँ? मेरा दिल और कमज़ोर हो गया...

दिल भी अब मेरा, आँसू छलकानें से कतरा रहा हैं;

वक्त एक बार फिर, कागज़ की कश्ती ही मेरे लिए ला रहा है;

दरिया पार करनें की फिर भी बहुत कोशिश की मैंनें,

अंबर फिर पानी बरसा कर, बीच मझधार मुझे डूबा रहा है...

नींदे विदा कर भी, मेरी आँखे क्यूँ नम होती नहीं ?

दिल को भी क्या अब मुझसे कुछ हमदर्दी नहीं ?

रूमाल आतुर हो चले अब, अश्कों से भीगने के लिए;

पर मेरी जिद्दी नज़रे स्तब्ध उन्हें देखतीं रही...

खामोश हूँ मैं या बेचैन, यह समझना नामुमकिन है;

है कमी काँधे की, या अकेलेपन की दस्तक है?

तनहाइयों में भींगा एहसास भी, रहम को पुकारता नहीं;

सहमे हुए ह्रदय को भी क्या अब, मेरी सहमति की जरूरत नहीं ?

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