S for Society

समाज के नाम पर मैनें हर ख्वाहिश को दबाया है,


रिश्तों को ना आज़मा पाए, जिंदगी को दांव पर लगाया है,


ऐसा मैं खोया तुझमे, मेरी अस्थियां भी ना मिलीं,


रीति रिवाजों के बिस्तर में, मुखौटों की चादर दिखीं...



धिक्कार है तुझपर, जो तूने मेरा अस्तित्व छीना,


अपनी ईर्षा की हवस में, न दिया मेरे मन को जीना,


कहूँ किसे, ये बेडियाँ मैनें ही तुझे दी हैं,


जिसकी जकड़न नें मेरे पंखों को लहू-लुहान की हैं...



दीए की रौशनी तू ले गया, छोड़ गया पैरों तले मेरे अंधेरा,


संसार की गोद में, रह गया मेरा ह्रदय अकेला,


सभ्यता का लिबास, मैनें झूठ में लिपटा पाया है,


संस्कृति के ढोंग में, इंसान ने दुर्बलता छुपाया है...



जब होगा एक दिन सवेरा, तब तुम देख पाओगे,


कैदियों की हसीं के भीतर, डर की तड़प पाओगे,


माँगेंगे खुदा से एक और जिंदगी, की समाज की बंदिशो से छूट सकें,


उसके मन की तो कर ली, इस बार खुद की मर्जी से जी सकें........

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