Purani Jeans

मैनें कहा वक्त से,

तू आगे चल, कि कुछ देर मैं यहीं ठहरना चाहती हूँ ;

तेरी बदलती गति पर, कुछ गौर फरमाना चाहती हूँ ;

बढ़ते वक्त में बहुत कुछ पीछे छूट गया है ;

उनपर फिर एक नज़र डालना चाहती हूँ ...

एक पुराना छोटा घर, धुँधला सा याद है;

छोटी सी रसोई, मेरा बिस्तर भी वहीं पास है;

दीवारें थोड़ी फिर भी नई है मगर;

बारिशों में गलती हुई छत का, अब भी एहसास है...

और माँ की कुर्बानियां मैं कैसे भूलूँ ;

जिसके ममता के आँचल नें, मुझे लोहे सा बनाया है ;

अपने आँसू छुपा कर, हमें हर पल हंसाती रही;

हजारों गलतियों पर भी, जिसने माफ करना सिखाया है ...

चंद ही सही, पर खास हैं मेरे ऐसे दोस्त;

जो कभी सीधी राहों पर चलने ना दिए;

केमिस्ट्री की हद देखी मैनें पागलपन से;

और केवल गल्तियों की प्रोबॅबलिटी सीखा किए...

ऐसी भी बातें हैं जिसे मन याद नहीं करना चाहती ;

कि कुछ दुश्मनी मैनें भी पाली हैं ;

कैसा वो कारवां भुलाएँ नहीं भूलता;

बेईमानी की आदतें मैनें दुश्मनों से ड़ाली हैं ...

एक समय, मेरे जीवन में ऐसा भी आया ;

जब मैंने खुदको बहुत अकेला पाया;

तब समझ आई मुझे, रिश्तों की एहमियत ;

अटूट बंधन भी मेरे, किसी काम ना आया...

जाते हुए वक्त से आखिर पूछ ही लिया मैनें ;

ऐसी नाइंसाफ़ी मेरे साथ तूने क्यूँ की थी?

कोशिश तो करता कभी मेरे दिल को जानने की ;

जो बिन पूछे छीना तूने, वो सिर्फ मेरी मुस्कुराहटें थीं ...

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