Pinjara
मुझे तुम आसमान की एक झलक दिखलादो,
कहाँ हूँ मैं, कैसा यह गगन,
बुझे बुझे चांद तारे, टूटे कितने कंगन,
फूलों की ये खुशबू, नाराज़गी से मुरझाई प्रिये ...
सहमी-सहमी सी माँ की झोली
जलते दिए की लौ तूफ़ानों से भिडी,
कौनसे शूल ह्रदय में चुभ से रहे,
कुछ भी नहीं सही, यह तू जान प्रिये ...
तबाह करके धूप की किरनें,
हिंसा की मिट्टी से बीज खिले,
कैसे निर्मित हो अहिंसा की भूमि,
अश्रुओं की बरसात के हैं काल प्रिये ...
भवन हैं सारे चार दीवारों में बंद
घुटती हुई सांसे, उदास आंगन कोनों में, सिमटा हुआ मन,
सारे रंग दामन से बिखरे हुए,
उलटी चमन में बेह रहीं हवा के, कैसे ये निशां प्रिये ...
दो स्वाद नशे के मिल जाए फिर कहीं से,
खूंटी से खोलो मेरी गर्दन, पास है कुआँ, खबर मिली कहीं से ,
प्यास बुझा लेने दो, भर लूँ वो पानी सुराही में ,
मरघट से दूर, एकांत जाने का मेरा प्रयास प्रिये...
बुद्धि से घायल, दिल भी मेरा घायल,
प्रेम की लालसा से सारे हैं बेहाल प्रिये
कल्पना है ये या हकीकत न जानें,
स्वयं को ढूँढने की, रही बस अभिप्षा प्रिये ...
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