Panchi

वो आए बड़े यकीं से, हम बेखौफ़ से हो गए,

वफा समझे जिसे, ज़लज़ले में झोंकते चले गए,

हमसे हमारा इरादा ना पूछों दोस्तों,

हुनर तो था संभालने का, फिर भी गिरते चले गए...

आंधी ऐसी चली, आंखों पर धूल झोंक कर,

क्या मिला उसे भला, परिंदे का घर उजाड़ कर,

पेड़ की टूटी शाखा संभाले, या खुदको कौन बताएं ?

पंछी तो आते ही हैं दुनियां में, अपने पंख लेकर...

कहतें हैं तूफान के बाद बारिश ठंडक लाती है,

लेकिन कुछ नमीं, धीरे से आंखों में दे जाती हैं,

बेअसर रही वफा का हम भी जश्न मनाएंगे,

भींगे नयनों के अश्कों को, बिखरी ज़ुल्फों से छुपाएंगे...

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