Naadaniyaan


अपनी नादानियाँ देख, कुछ अपने बारे में सोचूं,

तो समझ सकूं, जिंदगी के बदलते मायने,

पतली सी डोर से टिके हुए रिश्ते,

तो कभी, तनहाइयों में साथ खड़ी मेरी राहें ।

पतझड़ आई कभी मेरे हिस्से,

ख्वाब टकराए हकीकत से कभी मेरे,

हंसी में ही उड़ा दो, मेरी मुसाफ़िर सी फ़ितरत समझ लो,

कोई तलाश थी शायद, मेरी तड़प को ही मेरा सुकून समझ लो।

हुनर तो था, मेरे बदलते अंदाज़ को महफ़ूज रखा,

उड़ने में क्या बुराई थी? ज़माने को गुमराह रखा,

लोगों को कभी गलतफहमियों से बाहर आने ना दिया,

परछाई को भी कभी उसके नाम का जिक्र करने ना दिया।

अधूरी छोड़ दी है अब, कुछ शायरियाँ, चंद कवितायें,

थक गयी हैं कलम, पन्नो पर उनकी जगह मुनासिब कैसे बनाएँ?

किताब भरने चली, उम्र की झुर्रियों से मेरे,

ख़्वाहिशें ही तो हैं, पूर्णिमा की रात का पूरा चांद कैसे बनाएँ !!





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