Mere hone ka yakeen
यह समां फिर पहले क्यूँ जिंदगी में ना आया ?
जिसने मेरे होने का मुझे यकीन दिलाया ...
भीड़ में तो खुशी से कट रही थी मेरी जिंदगी,
आज ना जाने क्यूँ अकेलेपन की गहराइयों में मैैनें सुकून पाया ?
अब तक बीतें गमों से, उभर पाना जो लग रहा था नामुमकिन,
आज मैनें मेरा मन, समुद्र सा बहुत विशाल पाया...
छोटी लगने लगी हर वो खुशियाँ और निराशा,
जब पत्तियों के सरसराने की गूँज से, मैं शीतल से भर आया...
बंटे हुए से जो लग रहे थे मेरे जिस्म और अंतरात्मा,
किरनों और फूलों के रिश्तों ने, गलतियों का मेरे एहसास दिलाया...
तब समझे, मुझसे ही तो है, ये दिन, संध्या और रजनी,
कठिनाइयों के बावजूद, अपनी धुन से मैं जुड़ पाया...
आवारा है, चला जा रहा है मेरा सफ़र,
आख़िर दिल के सन्नाटों ने, ज़ख्मों पर मेरे मरहम लगाया...
ना रहा अब कोई दर्द, ना मिला कोई हमदर्द,
कोई और नहीं, सिर्फ मैं हूँ, खुदको मैनें जिंदा पाया...
Dr Shruti Nabriya
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