Main kahin nahi hoon

किस्तों में जीना नहीं, मुझे पूरा मर जाना है,

अपनी धुन में हूँ मैं, आख़िर मैंने माना है,

मुझसे खेलो मत, मैं हर पल झुलसती रहीं हूँ,

मुझे ढूंढना नहीं, मैं कहीं नहीं हूँ...

यह कैसा नकाबपोश समाज ने लपेटा है,

हँसते चहरे एक झूठ का मुखौटा है,

जंजीरों में कैद रहो, मैं तुमसी नहीं हूँ,

बेडियाँ तोड़ कर मैं जा चुकी हूँ...

रिश्तों का मोल भला किसने समझा है,

सात फेरों से नहीं, यह मन से जुडता है,

हाथ ना आऊँ मैं, हवा सी हूँ,

महसूस करना चाहो तो आस-पास ही हूँ...

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