Kitaab ka woh Phool
किताब को वो फूल सिरहाने तुझे याद कर, रातें काँटी हैं;
करवटों में महकती यादें, सपनों से बाँटी हैं;
मुहब्बत भरी किताब पर, आज जब मेरी निगाहें पड़ी;
बरसों बाद मिली उसमें, गुलाब की वो कली...
याद आई मुझे, छुअन तेरी, और हाथों की नर्मियाँ;
गुमसुम सी हसीं, और हसरतें थी दरमियां;
तेरा यूँ ख्व़ाब बनकर, अपना एहसास जता जाना,
मेरी नींदे उड़ाकर, हर दफे परेशान कर जाना.....
वो पेड़ के नीचे बैठे, मैं और तुम;
थरथराते हुए होंठ, ख़्वाहिशें गुमसुम;
नशे सी हवा का, हमारे बदन को छू जाना;
बिन कुछ कहे, जाने क्या क्या कह जाना.......
फिर एक दिन, उठा मन में एक सवाल;
रहा न जाए, कैसे कहूँ दर्द-ए-हाल;
जब उसने दी मुझे, अपने गुलाब की निशानी;
बिना कुछ सोचे, कुदरत से लढ़ने की मैंनें ठानी ....
पर मैं नहीं, तकदीर लिख रही थी मेरी लकीरें;
समझौतों की मुझपर, पड़ गई कैसी जंजीरें ?
रंजिशें कहूँ किसे, अलग हो रहा था मेरा मंज़र;
हौसलों के समंदर में, उठ रहा था बवंडर....
तो क्या हुआ, पूरा ना हुआ अगर इरादा;
काटों भरी राहों पर, चलने का तो ना किया था वादा?
फिर भी हर लम्हा हम, तुमसे दूर बढ़ते चले गए;
साँसें भी ना रूकीं, न जाने कैसे जी गए....
गुलाब की कुछ कलियाँ,अब भी संभालकर रखी हैं;
यादों के चादरों ने भी, तेरी महक चखी हैं;
इतिहास के पन्नों में, तेरी कुछ ऐसी प्रीत मिली;
सच्ची उल्फत की भी हमें, सज़ा खूब मिली...
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