Karz

हर्फ-दर-हर्फ सोच कर लिखती हूँ

की कहीं कोई गलती ना हो जाए;

सवाल तो पहले ही बोहोत खड़े हैैं ,

मेरी मुश्किलें और ना बढ़ जाए...

घर की खिड़कियों से ताकती रहती हूँ,

अनचाहा न दरवाजा खटखटा जाए;

कुछ हासिल करने की आढ में,

हम खुदगर्ज़ ना हो जाएँ ...

टूटी हुई छत भी आसरा देती है,

चाहे वो कितनी पुरानी हो जाए ;

भावनाओं की लहरें निश्चित नहीं ,

बहा कर न जाने कहाँ ले जाए ...

आरजूओं सेे मुंह मोड़ा नहीं जाता,

आदतें भारी पड़ जाए;

किश्तों में भी चुकाया नहीं जा सकता ,

जिंदगी का कर्ज बढ़ता चला जाए....

डाॅ. श्रुति नाबरिया

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