Jaago
चंद लम्हों को ही हम समेट पाते हैं,
बाकी रेत हाथों से फिसल जाती है,
कुछ ही बारिश की बूूँदें भिगा पाती है,
और तुम सोचते हो कि;
बेशुमार शोहरत हासिल कर ली है...
अफरा तफरी में सब मस्त हैं,
केवल हवस से सब सशस्त्र हैं,
दौड़ रहा रगों में पानी का रक्त है,
शरीर की ठंडक मालूम नहीं कि;
कहते हो आत्मा का झुलसना सख्त है...
यूहीं आते हैं और चले जाते हैं,
पसीने की कमाई का मजाक बनाते हैं,
मकान, दौलत ही तो हासिल कर पाते हैं,
बिस्तर पर पड़ते ही नहीं और;
गहरी नींद में कम सो पाते हैं...
जीवन नहीं किन्तु मसकरी है शायद,
इसलिए बोहोत कम समझ पाते हैं,
जीवों का वक्त फिजूल गंवाते हैं,
अफसोस भी करने आया नहीं कि;
फिर मृत्यु लोक में जन्म लेने आ जाते हैं...
डाॅ. श्रृति नाबरिया
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