Intezaar
कभी-कभी मेरे समझ आता नहीं,
मेरे दिल को चाहिए क्या होता है ?
चैन पास है मेरे कभी, कभी है बेचैनी,
इंतजार के सिवा, क्यूँ कुछ नज़र आता नहीं ?
वक्त ने कुछ तो मेरे लिए लिखा होगा,
एक बार ही सही, मेरा नाम कहीं लिया होगा,
इतना तो खुदगर्ज़ नहीं हो सकता वो किसी के लिए,
भरे बादलों कि प्यास देख, खुदा भी कभी रोया होगा...
अकेले सिर्फ हम ही नहीं, इतना समझ आया है,
बहुत कम हैं यहाँ, जो गहरी नींद सो पाया है,
साँसो की गिनती कर भी, बेवजह होगी,
कौन जीने का मकसद यहाँ, पूरा कर पाया है ?
राह अकेली है, अकेले ही तय करनी होगी,
मंजिल कि तलाश, अब मुझे यहीं रोकनी होगी,
लम्हा कैसा भी हो मगर मेरा तो है,
मुकद्दर छल करती है, कभी मेरी होगी, कभी न होगी....
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