Duaa

गुनहगार जबसे बना तू मेरे,
समझ नहीं आता कि, तुझे क्या सज़ा दूँ, 
नफ़रतों से गुनाह कम तो ना होगा तेरा,
ख़ुदा से शायद, तेरे लिए कुछ रहमत मांग लूँ ..

फिर भी, तू रोज़ एक नयी खता करना,
और मेरी नियत तुझपर, फिर मेहरबान होगी,
हिसाब कैसे लेगा उपर वाला भी तेरा ?
मेरे इश्क के कलम से, रोज तेरी गलती साफ होगी ...

एहसान मान लेना, तू भी मेरे तजुर्बों का,
तू तमन्नाओं को मेरे, कोई इलज़ाम ना देना ...
बेवजह नहीं था कुछ, खुदगर्ज़ ही कह लो मुझे, 
दुआओं में तू भी कभी... मेरा जिक्र कर लिया करना...





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