Dayeraa

मुकद्दर से हाथों की लकीरें हार ज़ाती हैं,

मेरी तस्वीरें मेरा मजाक बनाती हैं,

तहरीरें बदलने की कोशिश बोहोत करती हूँ,

वियोग ही पीछे पीछे चलीं आती है...

जितना भी सिमटने की आरज़ू करूँ,

उतना ज्यादा बिखरती जाती है,

जिस्म को काबू में कैसे रखखूं,

वही मुझसे दुश्मनी करना चाहती है...

चलो तकदीर का फैसला अपना भी लूँ,

जिद्द विद्रोह करना जानती है,

दायरा कितनी बार भी बना लूँ,

रेखाएँ पीछे खिसक आती हैं...

आखिरकार खुद से फिर दोस्ती करूँ,

फ़ितरत छल कर जातीं है,

खाली रातों को कैसे बिताऊँ,

तेरी नज्में चादर बन लिपट जाती है...

अपना प्यार किसी और से क्या बाँटूं,

भूली गजलें याद दिला देती है,

लफ्जों से बातें पूरी कैसे करूँ,

खामोशी मेरा गला घोंट जाती है....

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