ठहरना चाहूँ मैं अगर
कदम मेरे ठहर जाते हैं अब कभी कभी,
फिक्र की धूप को, परछाई से छुपाती हूँ कभी
कुछ देर सुकून की साँस भरूँ, अगर मैं राहों में,
तो ऐ जिंदगी, तुझे कोई ऐतराज तो नहीं ...
ना होंगी मुझे शिकायतें, अगर तू मेरे लिए ना रुकें,
ना रहेगा कोई गम, जो कुछ रिश्ते अधूरे से रहे,
बस जब रात की बाहों में, थकान मिटाना चाहूँ मैं ,
सुबह की आगोश, सवालों से ना घेरे मुझे ....
सोंचती हूँ, कि गुम हो जाएँ मेरे शब्दों रचना,
कि अब जवाब देने से कतराती हूँ मैं,
महज़ वादों का क्या है, जुबां से कभी भी फिसल जाए,
रेत से फिसलते लमहों में, खुदको गिरने से बचाती हूँ मैं ..
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